अतीत का प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता, उसे केवल समझा जा सकता है : शशि रंजन कुमार
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में ‘द डिक्लाइन ऑफ हिन्दू सिविलाइजेशन : लेसन्स फ्रॉम द पास्ट पर हुआ गंभीर बौद्धिक विमर्श
देहरादून। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र द्वारा शनिवार, 20 जून 2026 को आयोजित एक गरिमामय एवं अकादमिक कार्यक्रम में चर्चित पुस्तक ‘द डिक्लाइन ऑफ हिन्दू सिविलाइजेशन : लेसन्स फ्रॉम द पास्ट ‘ पर विस्तृत चर्चा, समीक्षा एवं विमर्श का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में पुस्तक के लेखक एवं संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के सचिव श्री शशि रंजन कुमार, आईएएस ने अपने शोध, पुस्तक की अवधारणा तथा भारतीय सभ्यता के ऐतिहासिक विकास, उपलब्धियों और चुनौतियों पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षाविदों, इतिहासकारों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, साहित्यकारों, पत्रकारों, प्रशासनिक अधिकारियों तथा शहर के बुद्धिजीवियों और जागरूक नागरिकों ने सहभागिता की।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री आनंद बर्द्धन, आईएएस, मुख्य सचिव, उत्तराखण्ड शासन थे, जबकि दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखे। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री एन. रवि शंकर, आईएएस, निदेशक, दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र ने की।
कार्यक्रम का आरम्भ अतिथियों के स्वागत एवं दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। इसके उपरान्त लेखक का परिचय प्रस्तुत किया गया तथा पुस्तक की विषयवस्तु और उसके महत्व पर संक्षिप्त प्रकाश डाला गया। सभागार में उपस्थित लोगों ने पुस्तक के विषय और लेखक के शोध कार्य के प्रति विशेष उत्सुकता दिखाई।
अपने व्याख्यान में श्री शशि रंजन कुमार ने कहा कि इतिहास को केवल गौरवगान या शिकायत के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उससे सीख लेकर वर्तमान और भविष्य को बेहतर बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “अतीत का प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता, उसे केवल समझा जा सकता है।” उनके अनुसार इतिहास का उद्देश्य समाज में वैमनस्य उत्पन्न करना नहीं, बल्कि आत्मबोध और आत्ममंथन की प्रक्रिया को सशक्त बनाना है।
उन्होंने बताया कि पुस्तक चार प्रमुख खंडों— चरमोत्कर्ष, पतन , पराजय और कारण में विभाजित है। यह पुस्तक व्यापक शोध, प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोतों, अभिलेखों, यात्रावृत्तांतों तथा तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित है। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता के दीर्घ इतिहास को समझने के लिए केवल राजनीतिक घटनाओं को देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामाजिक संरचनाओं, बौद्धिक परंपराओं, आर्थिक व्यवस्थाओं और सांस्कृतिक प्रवाहों का भी गहन अध्ययन आवश्यक है।
श्री कुमार ने भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि गणित, दशमलव पद्धति, शून्य की अवधारणा, खगोल विज्ञान, आयुर्विज्ञान, शल्य चिकित्सा, दर्शन, साहित्य, संगीत तथा सौंदर्यशास्त्र के क्षेत्रों में भारत ने विश्व को महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि सभ्यता के उत्थान और अवनति दोनों को समझना आवश्यक है, क्योंकि इन्हीं अनुभवों से भविष्य के लिए मार्गदर्शन प्राप्त होता है।
मुख्य अतिथि श्री आनंद बर्द्धन ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि यह केवल इतिहास की पुस्तक नहीं, बल्कि एक गंभीर वैचारिक दस्तावेज है जो पाठकों को भारतीय सभ्यता के विकासक्रम को समझने का अवसर प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि इतिहास के निष्पक्ष और गहन अध्ययन से समाज अपनी जड़ों, उपलब्धियों और चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझ सकता है।
उन्होंने विशेष रूप से दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह संस्थान देहरादून में बौद्धिक और सांस्कृतिक संवाद का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बन चुका है। साहित्य, इतिहास, संस्कृति, संगीत, कला, पर्यावरण, लोक परंपराओं और समकालीन सामाजिक विषयों पर नियमित रूप से आयोजित कार्यक्रमों ने इसे राज्य के प्रमुख बौद्धिक मंचों में स्थापित किया है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन न केवल ज्ञानवर्धन करते हैं, बल्कि समाज में संवाद और विचार-विमर्श की स्वस्थ परंपरा को भी मजबूत करते हैं।
मुख्य वक्ता प्रो. सुरेखा डंगवाल ने कहा कि इतिहास की व्याख्या समय-समय पर विभिन्न दृष्टिकोणों से की जाती रही है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारतीय इतिहास के कई पक्षों पर सीमित विमर्श हुआ, जबकि आज आवश्यकता है कि इतिहास को व्यापक, संतुलित और बहुआयामी दृष्टि से समझा जाए। उन्होंने कहा कि किसी भी सभ्यता के उत्थान और पतन का अध्ययन वर्तमान समाज को महत्वपूर्ण शिक्षाएँ प्रदान करता है और यह पुस्तक इसी दिशा में एक गंभीर प्रयास है।
उन्होंने कहा कि शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए यह पुस्तक विशेष रूप से उपयोगी है क्योंकि इसमें ऐतिहासिक तथ्यों और विश्लेषण को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया गया है। उनके अनुसार भारतीय सभ्यता के अध्ययन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक नए विमर्शों के द्वार खोलती है।
कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण आकर्षण संवाद एवं प्रश्नोत्तर सत्र रहा। इस दौरान उपस्थित शिक्षाविदों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, पत्रकारों तथा साहित्य प्रेमियों ने पुस्तक की विषयवस्तु, ऐतिहासिक स्रोतों, सभ्यताओं के पतन के कारणों, भारतीय ज्ञान परंपरा तथा समकालीन सामाजिक संदर्भों से जुड़े अनेक प्रश्न पूछे। श्री शशि रंजन कुमार ने विस्तारपूर्वक उत्तर देते हुए पुस्तक के विभिन्न अध्यायों, शोध पद्धति और निष्कर्षों पर प्रकाश डाला। इस संवादात्मक सत्र ने कार्यक्रम को अत्यंत जीवंत, रोचक और ज्ञानवर्धक बना दिया।
इस अवसर पर अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ भेंट कर किया गया। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से मुख्य अतिथि, मुख्य वक्ता तथा लेखक को स्मृति-चिह्न, पुस्तकें एवं प्रतीक-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में शहर के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। इनमें वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के शिक्षक, शोधार्थी, साहित्यकार, इतिहासकार, पत्रकार, अधिवक्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, कलाकार, सांस्कृतिक कर्मी, पुस्तक प्रेमी तथा विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों के विद्यार्थी शामिल थे। देहरादून के अनेक प्रबुद्ध नागरिकों ने कार्यक्रम में सक्रिय सहभागिता करते हुए पुस्तक और उसके विषय पर गंभीर रुचि व्यक्त की। सभागार लगभग पूर्णतः भरा रहा और पूरे कार्यक्रम के दौरान श्रोताओं की उत्साहपूर्ण उपस्थिति बनी रही। कार्यक्रम का संचालन कवि श्रीकांत श्री व कुणाल उनियाल ने किया.
उपस्थित प्रतिभागियों ने पुस्तक को भारतीय सभ्यता, इतिहास और बौद्धिक आत्ममंथन के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कृति बताते हुए इसकी सराहना की। अनेक प्रतिभागियों ने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम समाज में गंभीर पठन-पाठन और शोध संस्कृति को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अंत में अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री एन. रवि शंकर ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं सहयोगियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र का उद्देश्य समाज में अध्ययन, संवाद और विमर्श की संस्कृति को सशक्त बनाना है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भविष्य में भी संस्थान साहित्य, इतिहास, संस्कृति, पर्यावरण, लोक परंपराओं और समकालीन विषयों पर इसी प्रकार के सार्थक एवं उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित करता रहेगा











