मनुष्यता की घनीभूत पीड़ा के कवि मंगलेश डबराल को याद किया गया

मनुष्यता की घनीभूत पीड़ा के कवि मंगलेश डबराल को याद किया गया

देहरादून,18 मई, 2026। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र तथा जन संस्कृति मंच द्वारा प्रख्यात कवि मंगलेश डबराल की स्मृति में आज दून लाइब्रेरी के सभागार में एक दिवसीय कार्यक्रम“ आवाज़ भी एक जगह “ का आयोजन किया गया। आयोजन के पहले सत्र में स्मृति, विस्थापन और प्रतिरोध” विषय पर विचार सत्र में वक्ताओं ने मंगलेश डबराल की कविताओं की विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। दूसरे सत्र में 20 कवियों ने अपनी कविताएँ पढ़ीं।

विचार सत्र में ‘ आलोचना’ के संपादक आशुतोष कुमार ने कहा कि मंगलेश डबराल की कविताओं में विस्थापन सिर्फ़ भौगोलिक विस्थापन नहीं बल्कि उनके यहाँ विस्थापन आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक है। उनके यहाँ विस्थापन अस्मितामूलक है।

उन्होंने कहा कि मंगलेश की कविताओं में पीड़ा, अकेलापन व्यक्तिगत नहीं है। यह मनुष्य की पीड़ा, मनुष्य का अकेलापन है। मंगलेश जी ने पहाड़ की जो रोमांटिक छवि को नये रूप में गढ़ कर पहाड़ का डिस्टोपिया रचा। उनकी कविताओं में साधारण में असाधारण, उत्पीड़ित में विद्रोह की संभावनाओं की खोज करती हैं।

उन्होंने मंगलेश डबराल की कविताओं को सामाजिक संवेदना की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया. कहा कि उनकी कविताओं के महत्व को समझना 80-90 के समय और उसके बदलाव को महसूस करना है।

मंगलेश डबराल की कविताओं में गीतात्मकता की चर्चा करते हुए कहा कि इसे ठीक से समझा नहीं गया। संगीत केवल ताल, धुन, लय नहीं है बल्कि वह मुझे पर्दों के पार ले जाती है। वहाँ जहाँ सच्चाई और मनुष्यता की खोज है।

अनुवादक-संपादक दिगंबर मंगलेश डबराल के गद्य की चर्चा करते हुए उनके यात्रा वृत्तांत, संस्मरण को काव्य मय बताया। उन्होंने कहा कि मंगलेश जी पूरे जीवन समाज की तल्ख़ सचाइयों से टकराते रहे।

समकालीन जनमत के संपादक रामजी राय ने ग़ालिब के हवाले से कहा कि कविता की परिणति संगीत हो जाना है। मंगलेश भाषा को संगीत के स्तर पर उठाने की कोशिश करते रहे। घनीभूत पीड़ा स्मृतियों में छायी रहती है और घनीभूत पीड़ा केवल अपनी पीड़ा नहीं हो सकती बल्कि हम सबकी पीड़ा होती है खामोश आवाज और संगीत की तरह बजते हुए पहुंचता है। घनीभूत पीड़ा निरंतर चोट से पैदा है। यह चोट निजी, अतीत, सार्वजनिक और वर्तमान की है। उन्होंने कहा कि मंगलेश की भाषा पारदर्शी है जिसमें आर में कविता आती है और पार में कथ्य होती है। उनकी कविता अमूर्तन की अवस्था में में भी विषय वस्तु ओझल नहीं होती।

विचार सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ आलोचक रविभूषण ने कहा कि मंगलेश की कविता शब्दों से निकलती-फैलती बहुआयामी ध्वनियाँ हैं। ध्वनियाँ कविता को सशक्त बनाती हैं। उनकी कविता में विस्थापन सांस्कृतिक है। ऋत्विक घटक का सिनेमा इसी सांस्कृतिक विस्थापन को दिखाती हैं। मंगलेश की कविताओं में संगीत, चित्रकला, सिनेमा सहित कई कलायें आकर जुड़ती हैं। उनके यहाँ स्मृति, विस्थापन और प्रतिरोध अलग-अलग नहीं एक साथ हैं।

विचार सत्र का संचालन युवा आलोचक प्रेमशंकर ने किया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में प्रतिरोध का सिनेमा के संयोजक संजय जोशी द्वारा निर्मित वीडियो दिखाया गया जिसमें मंगलेश डबराल अपनी सात कविताओं का पाठ किया।

आयोजन के दूसरे सत्र कविता पाठ में जन संस्कृति मंच मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष, वरिष्ठ रंगकर्मी व कवि जहूर आलम की अध्यक्षता में वरिष्ठ कवि इव्वार रब्बी, राजेश सकलानी, कल्पना पंत, प्रतिभा कटियार, रेखा चमोली, रूपम मिश्र, रुचि बहुगुणा उनियाल, अतुल शर्मा, ऋतु डिमरी नौटियाल, राजेश पाल, पराग पावन, संदीप तिवारी, मृत्युंजय ने अपनी कविताएँ पढ़ीं। कविता पाठ का संचालन युवा कवि मृत्युंजय ने किया।

इस दौरान शहर के कई लेखक,साहित्यकार, रंगकर्मी, साहित्य प्रेमी व प्रबुद्धजन शामिल रहे।