किशोर कवयित्री सिद्धि भण्डारी के कविता संग्रह नेवर एंडिंग फिक्शन पुस्तक का लोकार्पण
देहरादून, 25अप्रेल, 2026,दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र की ओर से सभागार में किशोर कवयित्री सिद्धि भण्डारी के कविता संग्रह नेवर एंडिंग फिक्शन पुस्तक का लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया. कार्यक्रम में साहित्यकारों ने कहा कि कविता अपने समय की गवाही तो देती ही है वह पाठकों के मन-मस्तिष्क को अनवरत् समृद्ध करती रहती है। कविता मात्र शब्दों का जाल नहीं है वह तो कल, आज और कल का प्रतिबिंब भी बन जाती है। लोकार्पण समारोह में बतौर वक्ता साहित्यकार एवं शिक्षक मनोहर चमोली ‘मनु’ ने कहा कि विद्यार्थियों का खासकर किशोरों का साहित्य सृजन में दख़ल बढ़ना इस बात का संकेत है कि नई पौध स्वयं से दोस्ती करती है। वह आत्मअभिव्यक्ति को सबके सामने रखना चाहती है। नई पीढ़ी अपनी भावनाओं, अनुभूतियों और अपने अनुभवों को लेखन के ज़रिए अभिव्यक्त कर रही है। यह साहित्य के लिए सुखद है। उन्होंने कहा कि लेखन का मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और व्यक्तित्व के विकास में सीधा असर पड़ता है। लेखन के जरिए कोई भी आत्मखोज की दिशा में आगे बढ़ सकता है। खुद को परिष्कृत करते रहने के लिए लेखन एक सशक्त माध्यम है। मनोहर चमोली ने बताया कि इस संग्रह में कवयित्री की बीस कविताएं हैं। दस स्वयं के रेखाचित्र हैं। दस आत्मकथ्य टिप्पणियां है। कविताओं की विविधता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि कविताओं में आकाश, प्रेम, अंधेरा, उजाला, भावनाएं, मानवीय मूल्य, संवेग शामिल हैं। अमूर्त चीज़ों के सहारे कवयित्री ने मनुष्य की सोच और दशा का वर्णन भी किया है।
इससे पूर्व पुस्तक पर चर्चा करते हुए सुनीता मोहन ने सत्रह वर्षीय कवयित्री सिद्धि की लेखन यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने श्रोताओं को जानकारी देते हुए कहा कि कविताओं का दायरा बहुत बड़ा है। कविताओं के भीतर जो सोच है, दृष्टि है और सकारात्मकता है वह सोचने पर बाध्य करती है।
कविताओं में कवयित्री समाज की सोच, अपने आस-पास के माहौल के साथ स्वयं के मन के द्वंद्व भी सामने रखती हैं। सुनीता मोहन ने बताया कि इससे पता चलता है कि नई पीढ़ी साहित्य को पढ़ती है। समझती है और अपने विचारों और अभिव्यक्तियों को सलीके से रखने की प्रतिभा भी रखती है। उन्होंने बताया कि कवयित्री बेहद संवेदनशील है। छायाकार भी है तो चित्रकार भी है। खेल में भी उसकी दिलचस्पी है। सुनीता मोहन ने संग्रह की कविता डार्कनेस, एलोन, लाइफ लाइक स्वान पढ़कर सुनाई साथ ही कविताओं के आयामों पर भी बात की। सुनीता मोहन ने कहा कि इस दौर के बच्चों में अपार संभावनाएं हैं। वह दबाव को भी आनंद का क्षण बना लेते हैं। उन्होंने विस्तार से सिद्धि की कविताओं पर चर्चा की।
दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के तत्वाधान में आयोजित इस आयोजन में सत्रह वर्षीय सिद्धि भण्डारी ने कहा कि वह जैसा महसूस करती है। सोचती है। जो बातें-विचार बार-बार मन को उद्वेलित करते हैं, उसे कागज में उतार लेती हूँ। मुझे लगता है कि यह सब बातों को लिखकर मन शांत हो जाता है। यह बेवजह के तनाव को भी दूर करने का सशक्त माध्यम है। कवयित्री सिद्धि ने कहा कि मुझे लगता है कि हर किसी की अपनी एक कथा होती है। हम भूलते जा रहे हैं। हमारा देखना, सोचना, अवलोकन करना और इस धरती को सुंदर बनाने का भाव भी कम होता जा रहा है। हमें ठहरकर रुकना चाहिए। चीजों को देखना, सोचना, समझना चाहिए। उन पर बात करनी चाहिए।
पैनल चर्चा में मंतव्या ने सिद्धि का परिचय भी श्रोताओं के समक्ष रखा। साथ ही कुछ कविताओं का वाचन भी किया। कविताओं की रचना-प्रक्रिया और कविताओं के मक़सद भी सवाल किये। मंतव्या ने कहा कि बहुत सारे विषयों की पढ़ाई के दबाव के साथ रचनात्मक गतिविधियों में शामिल होना सिद्ध की विशेषता है।
कार्यक्रम की भूमिका और दून लाइब्रेरी रिसर्च सेन्टर के बारे में बोलते हुए बाल समन्वयक मेघा ने बताया कि सिद्धि दून पुस्तमालय के बाल केन्द्र की सदस्या है और सेन्टर की गतिविधियों में प्रतिभाग करती रहती हैं। पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. डी.के. पाण्डे ने सिद्धि की रचनात्मकता की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह यात्रा का पहला कदम हैं। किताबों के संसार में जाना। उनसे दोस्ती करना और फिर इस संसार में अपना योगदान देना सराहनीय है। उन्होंने दोहराया कि किताबों से ही बदलाव के सूत्र मिलते हैं।
कीर्ति भंडारी ने कहा कि कवयित्री सिद्धि बहुआयामी रुचियां रखती हैं। एक ऐसे पड़ाव पर वह है कि दोस्त और सलाहकार भी बन गई है। उन्होंने कहा कि बतौर अभिभावक बच्चों को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं। बच्चों की ख़्वाहिशों को पूरा करना सभी के वश में नहीं होता। लेकिन सिद्धि असीमित ऊर्जा से भरी है। बिजेन्द्र भण्डारी ने कवयित्री को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि हर किसी को सकारात्मक, बच्चों की हॉबीज़ों को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। इस दौर के बच्चे अपने लिए रास्ता स्वयं बना लेते हैं।
इससे पूर्व संचालन कर रहे साहित्यकार प्रदीप बहुगुणा ‘दर्पण’ ने कवयित्री का परिचय सामने रखा। पुस्तक के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रयास अभिभावकों-शिक्षकों के सहयोग से ही संभव हैं। पढ़ाई और अंकों की दौड़ में दौड़ रहे समाज को संवेदनशील, सहयोगी और साझी विरासत की परंपरा में चलने के लिए साहित्य बहुत बड़ा औज़ार है। उन्होंने कहा कि पढ़ाई और कॅरियर की चिंता के साथ-साथ कला, साहित्य और संगीत को साथ लेकर चलने वाले विद्यार्थी कुछ अलग ढंग से समाज के योगदान में सहयोग करते हैं। उन्होंने इस अवसर पर अंकुर एक सृजनात्मक पहल के अध्यक्ष मोहन चौहान की गतिविधियों और सोच का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि छह साल पहले अंकुर एक सृजनात्मक पहल की रचनात्मक कार्यशाला में सिद्धि ने भी प्रतिभाग किया था। सरल एवं यथार्थ लेखन की उस कार्यशाला का असर बच्चों में लंबे समय तक दिखाई भी दिया और बच्चे संवेदनशील बनें। सहयोगी बनें यह प्रयास समाज को करना ही चाहिए.
इस अवसर पर विजय भट्ट, जे.पी. मैठाणी, मोहन चौहान, तूलिका चौहान, आर.पी. विशाल, पुस्तकालयाध्यक्ष, जेबी गोयलमीनाक्षी कुकरेती, स्वीटी शर्मा, जगदीश सिंह,राकेश कुमार, वी.के.डोभाल सहित नगर के कई साहित्यकार, शिक्षक, नाट्यकर्मी, संस्कृतिकर्मी एवं छात्र उपस्थित रहे।











