चिपको आंदोलन के अग्रणी जननायक कुंवर प्रसून के पर्यावरण और जन-सरोकारों पर दून पुस्तकालय में विचार गोष्ठी
देहरादून, 15 जुलाई 2026। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र की ओर से बुधवार को केंद्र के सभागार में चिपको आंदोलन के अग्रणी जननायक, प्रखर पत्रकार, पर्यावरण योद्धा और सामाजिक कार्यकर्ता कुंवर प्रसून के पर्यावरणीय तथा सामाजिक सरोकारों पर एक विचार गोष्ठी आयोजित की गई। इस अवसर पर पत्रकार एवं लेखक शीशपाल गुसाईं द्वारा लिखित पुस्तक ‘कलम का गांधी : कुंवर प्रसून और जन-सरोकार’ का लोकार्पण भी किया गया।
पुस्तक का लोकार्पण कुंवर प्रसून की पत्नी श्रीमती रंजना भंडारी, मंचासीन अतिथियों तथा वक्ताओं की उपस्थिति में संपन्न हुआ। वक्ताओं ने कहा कि कुंवर प्रसून उत्तराखंड में जनपक्षधर पत्रकारिता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक आंदोलनों की एक सशक्त परंपरा के प्रतिनिधि थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन हिमालय, जंगल, जल, जमीन और जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया।
कार्यक्रम में प्रो. जयंत बंद्योपाध्याय, विशिष्ट फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, कोलकाता; विजय जड़धारी, प्रणेता, बीज बचाओ आंदोलन; राजीव लोचन साह, संपादक, नैनीताल समाचार; वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा; वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत तथा युगवाणी के संपादक संजय कोठियाल मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे।
प्रो. जयंत बंद्योपाध्याय ने कहा कि कुंवर प्रसून ने हिमालयी समाज और पर्यावरण के प्रश्नों को स्थानीय सीमाओं से निकालकर राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया। उनका जीवन यह संदेश देता है कि विकास की अवधारणा प्रकृति और समाज के संतुलन के बिना अधूरी है।
बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी ने कहा कि प्रसून ने जंगल, खेती, बीज और संस्कृति को एक-दूसरे से जुड़ी इकाइयों के रूप में देखा। वे मानते थे कि स्थानीय कृषि प्रणालियों और पारंपरिक बीजों का संरक्षण हिमालयी समाज की आत्मनिर्भरता और अस्तित्व के लिए आवश्यक है।
नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन साह ने कहा कि कुंवर प्रसून को निरंतर याद किया जाना चाहिए, क्योंकि वे विचार और आचरण की एक दुर्लभ संगति थे। उन्होंने अस्कोट-आराकोट यात्रा का एक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि चप्पल टूट जाने के बाद प्रसून ने संकल्प लिया था कि वे केवल ऐसे पशु के चमड़े से बनी चप्पल पहनेंगे जिसकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से हुई हो। यह प्रसंग उनके अहिंसक जीवन-दर्शन और संवेदनशीलता का परिचायक है।
वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा ने कहा, “कुंवर प्रसून ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। वे खरा सोना थे। उनकी ईमानदारी, सादगी और प्रतिबद्धता आज की पत्रकारिता के लिए प्रेरणा है।”
वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत ने कहा कि कुंवर प्रसून ने पत्रकारिता को जनसंघर्षों की आवाज बनाया। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से पर्यावरणीय विनाश, सामाजिक अन्याय और प्रशासनिक विसंगतियों को लगातार उजागर किया।
युगवाणी के संपादक संजय कोठियाल ने कहा कि कुंवर प्रसून जैसा पत्रकार होना आसान नहीं है। उन्होंने युगवाणी में अनेक कालजयी रिपोर्टें लिखीं, जो आज भी पत्रकारिता की महत्वपूर्ण धरोहर मानी जाती हैं।
वक्ताओं ने कहा कि कुंवर प्रसून केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि जनचेतना की एक सशक्त धारा थे। उन्होंने अपने जीवन में सत्ता और व्यवस्था से समझौता करने के बजाय सदैव जनता, प्रकृति और सत्य का पक्ष चुना। चिपको आंदोलन से लेकर बीज बचाओ आंदोलन, खनन विरोध और टिहरी बांध आंदोलन तक उनका जीवन संघर्ष और प्रतिबद्धता का पर्याय रहा।
लेखक शीशपाल गुसाईं ने बताया कि ‘कलम का गांधी : कुंवर प्रसून और जन-सरोकार’ केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पर्यावरणीय, सामाजिक और जन आंदोलनों के इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। 244 पृष्ठों और 54 अध्यायों में विस्तृत यह पुस्तक लगभग दो वर्षों के शोध, अध्ययन, साक्षात्कारों और ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर तैयार की गई है। पुस्तक में कुंवर प्रसून के जीवन-संघर्ष, चिपको आंदोलन, बीज बचाओ आंदोलन, समान शिक्षा अभियान, खनन विरोध, टिहरी बांध आंदोलन तथा जनपक्षधर पत्रकारिता को विस्तार से दर्ज किया गया है। इसमें उनके जातिसूचक उपनाम का त्याग कर केवल ‘प्रसून’ के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने, लोक-संस्कृति और मंडाण के माध्यम से जनजागरण करने तथा राष्ट्रीय स्तर की पत्रकारिता में उनके योगदान का भी उल्लेख है। लेखक के अनुसार यह पुस्तक एक व्यक्ति की जीवनी से अधिक उत्तराखंड के जन आंदोलनों और सामाजिक चेतना के विकास की कहानी है।
वक्ताओं ने विशेष रूप से चिपको आंदोलन में कुंवर प्रसून की भूमिका को याद किया। उन्होंने कहा कि 1970 के दशक में जब उत्तराखंड के जंगलों पर व्यावसायिक कटान का संकट गहराया, तब प्रसून जंगलों की रक्षा के संघर्ष के अग्रिम मोर्चे पर खड़े दिखाई दिए।
वक्ताओं ने बताया कि वर्ष 1978 के ऐतिहासिक अदवाणी वन आंदोलन में कुंवर प्रसून ने धूम सिंह नेगी, विजय जड़धारी, प्रताप शिखर, बचनी देवी, सुदेशा देवी, जीवानंद श्रीयाल और रामराज बडोनी सहित अनेक आंदोलनकारियों के साथ मिलकर जंगल बचाने की लड़ाई लड़ी। सकलाना, भिलंगना, ढूंगमंदार और बड़ियारगढ़ सहित उत्तराखंड के अनेक क्षेत्रों में वे वन संरक्षण और जन-अधिकार आंदोलनों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे।
प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा के साथ भी उन्होंने अनेक पर्यावरणीय अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जंगलों की नीलामी और कटान के विरोध में उन्होंने जेल यात्राएं कीं, लेकिन अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।
कुंवर प्रसून ने पारंपरिक बीजों और जैव विविधता के संरक्षण के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किया। वे रासायनिक खेती और हरित क्रांति के अंधानुकरण के आलोचक थे। उन्होंने पारंपरिक धान की सैकड़ों स्वदेशी प्रजातियों के संरक्षण तथा बीज बचाओ आंदोलन की चेतना को व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उनका संघर्ष केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं था। समान शिक्षा के प्रश्न पर वे मुखर रहे और वर्ष 1978 के ‘दून मार्च’ से भी जुड़े रहे। उनका मानना था कि शिक्षा में असमानता सामाजिक विषमता को जन्म देती है।
कटालड़ी क्षेत्र में चूना-पत्थर खनन के विरुद्ध संघर्ष में भी उन्होंने निर्णायक भूमिका निभाई। खनन माफिया और प्रशासनिक दबावों के बावजूद वे स्थानीय समुदायों के साथ मजबूती से खड़े रहे और पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई को जन आंदोलन का स्वरूप दिया।
टिहरी बांध आंदोलन के दौरान भी वे सुंदरलाल बहुगुणा के साथ सक्रिय रहे। विशेष रूप से हाईटेंशन लाइन निर्माण के लिए प्रस्तावित पेड़ों की कटाई के विरोध में उन्होंने स्थानीय लोगों को संगठित किया और वैज्ञानिक तथा पर्यावरणीय तर्कों के साथ संघर्ष का नेतृत्व किया।
इस अवसर पर कुंवर प्रसून स्मृति मंच की ओर से वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन रौतेला को प्रथम ‘कुंवर प्रसून स्मृति पर्यावरण एवं जनपक्षधर पत्रकारिता सम्मान–2026’ से सम्मानित किया गया। सम्मान के अंतर्गत उन्हें ₹11,000 की सम्मान राशि, सम्मान-पत्र तथा अंगवस्त्र प्रदान किया गया। सम्मान-पत्र का वाचन प्रो. अनुपम भंडारी ने किया।
वक्ताओं ने कहा कि मध्य हिमालय, उत्तराखंड के जन-सरोकारों तथा पर्यावरणीय मुद्दों पर जगमोहन रौतेला की निरंतर और प्रतिबद्ध पत्रकारिता उन्हें इस सम्मान का उपयुक्त अधिकारी बनाती है। यह सम्मान जनपक्षधर पत्रकारिता की उस परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास है, जिसे कुंवर प्रसून ने अपने जीवन और लेखनी से सशक्त बनाया।
कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि कुंवर प्रसून भले ही आज हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं हैं, लेकिन उनकी विचारधारा, उनकी निर्भीक कलम और पर्यावरण तथा जनता के अधिकारों के लिए उनका संघर्ष आज भी जीवित है और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
इस अवसर पर पद्मश्री कल्याण सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू, वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवाड़ी, पूर्व सूचना आयुक्त योगेश भट्ट, दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी, पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. डी. के. पाण्डे, डॉ. योगेश घस्माना दिनेश जोशी, दीवान बोरा, जेपी पंवार, सत्यानंद बडोनी, चंदन सिंह नेगी, देवेन्द्र कुमार कांडपाल, डॉ.वी. के डोभाल, रंजना भंडारी,डॉ. लालता प्रसाद, सुंदर सिंह बिष्ट देवेन्द्र बुड़ा कोटी, प्रदीप कुकरेती, अनुपम भंडारी,अरविंद शेखर, मनोज चंदोला, आलोक सरीन, शूरवीर सिंह रावत सहित बड़ी संख्या में पत्रकार, साहित्यकार, पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता तथा राज्य आंदोलनकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. भारती मिश्रा ने किया.











