दून पुस्तकालय ने आयोजित की मानव शिक्षा पर वार्ता

दून पुस्तकालय ने आयोजित की मानव शिक्षा पर वार्ता

देहरादून, 8 अप्रेल, 2026.दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र की ओर से आज सायं मानव शिक्षा :आवश्यकता,प्रक्रिया और उपलब्धि पर मध्यस्थ दर्शन प्रबोधक राजेश बहुगुणा की एक वार्ता आयोजित की गई. केन्द्र के सभागार में आयोजित इस वार्ता में मध्यस्थ दर्शन के आलोक में पृथ्वी पर समाधान, समृद्धि, निर्भीकता और सह-अस्तित्व स्थापित करने के लिए मानव शिक्षा की प्रकृति पर बात की गई । यह वार्ता ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित सह-अस्तित्व दर्शन – जीवन का विज्ञान पर आधारित रही.वार्ता में राजेश बहुगुणा ने कहा कि मानव के अध्ययन के बिना – मानव शिक्षा योजना अधूरी है।

मध्यस्थ दर्शन,सह-अस्तित्ववाद’ पर आधारित मानवीय शिक्षा पर बोलते हुए उन्होंने उक्त बात को विस्तार देते हुए कहा कि – मानव जो कुछ करता है वह निरंतर सुख के लिए करता है । इसी सुख को प्राप्त करने के लिए वह शिक्षा ग्रहण करता है । लेकिन जिस मानव को शिक्षा चाहिए उस मानव का अध्ययन ही अभी तक पूरी तरह से नहीं हो पाया है ।

उन्होनें आगे कहा कि जहां विज्ञान ने उसे मात्र मस्तिष्क से संचालित हाड़-मांस शरीर बताया जिसके समस्त भाव किसी भौतिक-रासायनिक क्रिया से संपादित होते हैं । और उसे भौतिक यंत्रों और रासायनिक पदार्थों द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है । ऐसा मानव शरीर को मिलने वाली सुविधाओं से सुखी होता है,वहीं दूसरी तरफ धार्मिक मान्यताओं के आधार पर मानव शरीर से भिन्न कोई अभौतिक वास्तविकता है जिसे आत्मा/रूह आदि कहा गया है । और ऐसा मानव आत्मा को अनुभव और ईश्वर की भक्ति से सुखी होता है । इसलिए विज्ञान आधारित शिक्षा से भोग को बढ़ावा मिला।

इस बात को विस्तार देते हुए उन्होंने आगे कहा कि इन कारणों सें धरती का प्राकृतिक वातावरण ही खतरे में आ गया, कहीं समाज में धर्मों की आपसी लड़ाई ने सामाजिकता को ध्वस्त किया । इसका मूल कारण है कि विज्ञान और धर्म दोनों ने ही सम्पूर्ण मानव के अध्ययन को जगह नहीं दी ।

बहुगुणा ने कहा कि विज्ञान ने केवल शरीर को महत्व दिया मानसिक पक्ष को एक तरह से भौतिक-रासायनिक प्रक्रिया मानकर उसे शरीर की ही प्रक्रिया मान लिया । इसलिए विज्ञान शिक्षा में शरीर का अध्ययन मुख्य भाग है । दूसरी तरफ धार्मिक-आध्यात्मिक विचारों में शरीर बंधन का कारण बताया और उससे मुक्ति के लिए साधना/कर्मकांड को मुख्य बताया । इसी वजह से धार्मिक शिक्षा में ईश्वर/आत्मा ही मुख्य भाग है । वास्तव में मानव शरीर के रूप में भौतिक अभिव्यक्ति है तो भाव (प्रेम,सम्मान, विश्वास आदि) के रूप में अभौतिक अभिव्यक्ति है । दोनों का सह-अस्तित्व है ।

अंत में राजेश बहुगुणा ने कहा कि मानव अस्तित्व में एक वास्तविकता है । उसकी भौतिक और भावनात्मक अध्ययन आवश्यकताएं हैं । दोनों ही प्रकार की आवश्यकता के लिए शिक्षा है । अत: मानव का अध्ययन और उसकी भौतिक-भावनात्मक आवश्यकता का अध्ययन और उसकी पूर्ति प्रक्रिया का अध्ययन ही मानवीय शिक्षा उद्देश्य है ।

वार्ता से पूर्व दून पुस्तमालय एवं शोध केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने उपस्थित लोगों स्वागत करते हुए अतिथि वार्ताकार काअभिनंदन किया और परिचय दिया.

इस अवसर पर प्रमोद,पसबोला, एमएस रावत, जी.एस बिष्ट, उत्तम रावत, अनिशा, इन्दु, मनमोहन चौहान, दून पुस्तकालय के पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. डी. के. पाण्डे, हिमांशु बहुगुणा, मुकेश कुमार, हरि ओम पाली, अद्वैता, प्रकाश नागिया, प्रेम पंचोली, हिमांशु जोशी, बिट्टू चौहान, नरेश, महेन्द्र सिंह, डॉ. वी के डोभाल, संदीप तोमर.सुंदर सिंह बिष्ट व जगदीश सिंह महर सहित, लेखक, सामाजिक चिंतक, युवा पाठक व शहर के अन्य प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे।