दून पुस्तकालय में ‘रेशियोज़ इन द रिपब्लिक’ पुस्तक का लोकार्पण और चर्चा
देहरादून, 21 अगस्त 2026। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के सभागार में शुक्रवार को भारतीय राजस्व सेवा से सेवानिवृत्त अधिकारी डॉ. देवी प्रसाद सेमवाल की पुस्तक ‘रेशियोज़ इन द रिपब्लिक : वोटर्स चॉइस पैटर्न्स इन द वर्ल्ड्स लार्जेस्ट डेमोक्रेसी’ का लोकार्पण किया गया। पुस्तक लोकार्पण के बाद आयोजित चर्चा में भारत के चुनावी लोकतंत्र, मतदाता व्यवहार, सामाजिक परिस्थितियों और सात दशकों में उभरते चुनावी पैटर्न पर गंभीर और रोचक बातचीत हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री एन. रवि शंकर, आईएएस, मानद निदेशक,दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र तथा पूर्व मुख्य सचिव, उत्तराखण्ड शासन ने की। बातचीत में श्री अनिल रतूड़ी, पूर्व पुलिस महानिदेशक, उत्तराखण्ड ने पुस्तक पर महत्वपूर्ण विचार रखे।
पुस्तक में भारत में हुए 1951-52 से 2024 तक के सभी 18 लोकसभा चुनावों को आधार बनाकर मतदाताओं के निर्णय और चुनावी परिणामों में दिखाई देने वाले पैटर्न को समझने का प्रयास किया गया है। लेखक ने केवल राजनीतिक दलों, नेताओं, चुनाव प्रचार अथवा तत्कालीन राजनीतिक घटनाओं को ही विश्लेषण का आधार नहीं बनाया है, बल्कि यह सवाल उठाया है कि क्या करोड़ों मतदाताओं के सामूहिक निर्णयों में मानव व्यवहार के कुछ ऐसे गहरे और बार-बार दिखाई देने वाले पैटर्न मौजूद हैं, जिन्हें व्यापक स्तर पर समझा जा सकता है।
चर्चा के दौरान डॉ. सेमवाल ने बताया कि पुस्तक का मूल विचार यह नहीं है कि किसी व्यक्ति का चुनावी निर्णय केवल उसके ‘जीन’ या आनुवंशिक प्रवृत्तियों से निर्धारित होता है। इसके बजाय पुस्तक जीन और वातावरण की परस्पर क्रिया को समझने का प्रयास करती है। परिवार, शिक्षा, संस्कृति, आर्थिक स्थिति, सामाजिक परिवेश, राजनीतिक घटनाएं, नेतृत्व और समय-समय पर बदलती परिस्थितियां मानव व्यवहार को प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि समान प्रवृत्तियां अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में अलग रूप ले सकती हैं।
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने पुस्तक के विषय और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर लेखक से अनेक सवाल किए। सवाल-जवाब के दौरान यह जानने की उत्सुकता दिखाई गई कि क्या चुनावी परिणामों के आधार पर मतदाता व्यवहार में कोई दीर्घकालिक प्रवृत्ति पहचानी जा सकती है, राजनीतिक परिस्थितियां और सामाजिक वातावरण मतदाताओं के निर्णय को किस तरह प्रभावित करते हैं तथा क्या अतीत के चुनावी आंकड़ों के अध्ययन से भविष्य के लोकतांत्रिक व्यवहार को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिल सकती है। लेखक ने स्पष्ट किया कि पुस्तक किसी चुनाव के परिणाम की निश्चित भविष्यवाणी करने का दावा नहीं करती, बल्कि उपलब्ध चुनावी अनुभवों और सामाजिक संदर्भों के आधार पर मानव व्यवहार के व्यापक पैटर्न को समझने की कोशिश करती है।
अध्यक्षता करते हुए श्री एन. रवि शंकर ने लोकतंत्र में मतदाता के निर्णय की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में चुनाव केवल राजनीतिक सत्ता के निर्धारण की प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि वे समाज की सोच, आकांक्षाओं और बदलती प्राथमिकताओं को भी सामने लाते हैं।
श्री अनिल रतूड़ी ने पुस्तक के विषय को समकालीन सामाजिक और प्रशासनिक संदर्भों से जोड़ते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को समझने के लिए केवल राजनीतिक घटनाओं को देखना पर्याप्त नहीं है। सामाजिक व्यवहार, नेतृत्व, परिस्थितियां और जनमानस की भूमिका को भी समझना आवश्यक है।
कार्यक्रम में यह बात भी उभरकर सामने आई कि चुनावों का अध्ययन केवल राजनीतिक विश्लेषण तक सीमित नहीं रहना चाहिए। मतदाता व्यवहार और सामाजिक परिस्थितियों के बीच संबंधों की बेहतर समझ सार्वजनिक नीति, प्रशासन और व्यापक मानव कल्याण के लिए भी उपयोगी हो सकती है।
यह पुस्तक एक शांत लेकिन गहन प्रश्नों की पड़ताल करती है: गोपनीयता और स्वतंत्रता के साथ मतदान करने वाले लाखों लोग बार-बार पहचाने जा सकने वाले चुनावी प्रतिरूप क्यों उत्पन्न करते हैं? व्यवहार आनुवंशिकी, जनसंख्या पारिस्थितिकी, सामाजिक-राजनीतिक अध्ययन तथा भारतीय आम चुनावों के साढ़े सात दशकों (1951-52 से 2024 तक) के आँकड़ों के आधार पर यह पुस्तक संकेत देती है कि लोकतांत्रिक परिणामों में ऐसे नियमित प्रतिरूप दिखाई दे सकते हैं, जो आनुवंशिक रूप से प्रभावित मतदाता-प्रवृत्तियों में निहित विरासत-सदृश नियमों से जुड़े हो सकते हैं और जो बदलते सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक परिवेश में सक्रिय रहते हैं।
जैविक नियतिवाद का कोई दावा किए बिना, यह अध्ययन इस बात की पड़ताल करता है कि बड़े पैमाने पर होने वाला चुनावी व्यवहार किस प्रकार संभाव्य संरचनाओं को प्रदर्शित कर सकता है, जो प्राकृतिक जनसंख्याओं में लंबे समय से देखे जाने वाले प्रतिरूपों से मिलती-जुलती हैं। भारत का विशाल, विविधतापूर्ण और निरंतर विकसित होता मतदाता वर्ग इस प्रकार के अध्ययन के लिए विशेष रूप से उपयुक्त आधार प्रदान करता है।
जनसंख्या-केंद्रित और अंतर्विषयक दृष्टिकोण से चुनावी इतिहास को देखने वाली यह पुस्तक विचारधारा और तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक चुनावों के भीतर मौजूद गहरे संरचनात्मक चक्रों और प्रतिरूपों को सामने लाती है। अंततः यह पाठकों को चुनावों को केवल सत्ता के लिए होने वाले संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि मानव व्यवहार की उन स्थायी अभिव्यक्तियों के रूप में देखने के लिए प्रेरित करती है, जो जीवविज्ञान और पर्यावरण के परस्पर संबंध से निर्मित होती हैं।
लेखक डॉ. देवी प्रसाद सेमवाल ने कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल से प्राणीशास्त्र (कीटविज्ञान) में मास्टर डिग्री तथा जनसंख्या पारिस्थितिकी में पीएच.डी. प्राप्त की। उन्होंने 1980 में अपने विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया, जहाँ उन्होंने आनुवंशिकी, पारिस्थितिकी और कीटविज्ञान पढ़ाया। सार्वजनिक सेवा में आने से पहले, वर्ष 1982 में उन्हें CSIR की सीनियर रिसर्च फेलोशिप (SRF) प्रदान की गई।
बाद में, 1985 में उनका चयन भारतीय राजस्व सेवा (IRS) के लिए हुआ और उन्होंने LBSNAA, मसूरी तथा नेशनल एकेडमी ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (NADT), नागपुर में प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके पश्चात उन्होंने LL.B. और LL.M. की डिग्रियाँ हासिल कीं, जिससे प्राकृतिक विज्ञान और विधि—दोनों क्षेत्रों में उनकी विद्वतापूर्ण पृष्ठभूमि और समृद्ध हुई।
भारतीय राजस्व सेवा में उन्होंने भारत सरकार के लिए कर प्रशासन, जाँच, सतर्कता, अपीलीय कार्यों तथा एक दशक से अधिक समय तक केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT), वित्त मंत्रालय के कर नीति एवं विधान (TPL) प्रभाग में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण कार्यों के साथ-साथ बारह वार्षिक वित्त विधेयकों (Annual Finance Bills) के प्रारूप तैयार करने में भी योगदान दिया।
डाॅ. सेमवाल स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते हैं और भारतीय निर्वाचन आयोग के संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों से संबंधित कार्यों के पर्यवेक्षक के रूप में उन्होंने भारत की चुनावी प्रक्रिया की जमीनी वास्तविकताओं को समझने का महत्त्वपूर्ण अनुभव प्राप्त किया। यह कार्य उनके जैविक विज्ञान, संवैधानिक शासन, मतदाता व्यवहार और सार्वजनिक नीति से जुड़े विविध बौद्धिक हितों के संगम को दर्शाता है।
कार्यक्रम में उपस्थित बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों, अधिकारियों और युवा पाठकों ने दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की इस पहल को सार्थक बताते हुए कहा कि पुस्तक केन्द्रित ऐसे संवाद सार्वजनिक बौद्धिक जीवन को समृद्ध करते हैं और पुस्तकालय को अध्ययन के साथ-साथ विचार-विमर्श के सक्रिय केन्द्र के रूप में स्थापित करते हैं।
कार्यक्रम का संचालन श्री डी. के. पाण्डे, पुस्तकालयाध्यक्ष एवं प्रशासनिक अधिकारी, दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र ने किया।
इस अवसर पर पूर्व प्रमुख सचिव विभापुरी दास, मुख्य सूचना आयुक्त, श्रीमती राधा रतूड़ी, दून पुस्तकालय के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी,डॉ.पंकज नैथानी, डॉ. कृपा राम नौटियाल, डॉ. लालता प्रसाद, सुंदर बिष्ट, योगिता थपलियाल, गीतांजलि भट्ट, कल्याण बुटोला, सुरेन्द्र सजवाण, अरुण कुमार असफल,. प्रेम पंचोली, डॉ. कुसुम नौटियाल, डॉ. गैरोला, जे.सी. नैथानी, हरिओम पाली, सहित प्रशासन एवं विभिन्न विभागों से जुड़े अधिकारी, शिक्षाविद, बुद्धिजीवी, पत्रकार, साहित्यकार, लेखक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में युवा पाठक उपस्थित रहे।











