उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में सामाजिक-पारिस्थितिक परिवर्तन और शहरी नियोजन से जुड़े मुद्दों के अध्ययन पर कार्यशाला
देहरादून 09 जनवरी 2026. उत्तराखंड के सिमल्टी–बिंता, पनुआनौला एवं अल्मोड़ा क्षेत्र में सामाजिक-पारिस्थितिक परिवर्तन और शहरी नियोजन से जुड़े मुद्दों का अध्ययन” शीर्षक से एक परियोजना प्रस्तुति आज दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, देहरादून में आयोजित की गई। इस कार्यक्रम का संयुक्त आयोजन उत्तराखंड सेवा निधि पर्यावरण शिक्षा संस्थान, अल्मोड़ा तथा डीआईटी विश्वविद्यालय, देहरादून द्वारा किया गया।
प्रस्तुति में एक व्यापक तकनीकी अध्ययन के निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए, जो अल्मोड़ा क्षेत्र—विशेषकर सिमल्टी–बिंता एवं पनुआनौला—में नए एवं उभरते हुए बसावट क्षेत्रों के लिए विजन स्टेटमेंट के रूप में कार्य करता है। अध्ययन में हिमालयी पहाड़ी बसावटों के समक्ष मौजूद प्रमुख चुनौतियों—जैसे वास्तुकला से जुड़े मुद्दे, नाजुक पारिस्थितिकी, जल संकट, ढलानों की अस्थिरता, बुनियादी ढांचे की कमी, यातायात जाम, प्रदूषण तथा पारंपरिक एवं जलवायु-अनुकूल निर्माण पद्धतियों के क्षरण—पर प्रकाश डाला गया। साथ ही, भू-आकृति आधारित, विकेंद्रीकृत एवं समुदाय-केंद्रित समाधान प्रस्तावित किए गए।
डॉ. अशुतोष जोशी, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष (प्लानिंग), डीआईटी विश्वविद्यालय, देहरादून ने मुख्य वक्तव्य देते हुए उत्तराखंड के पहाड़ी कस्बों के लिए पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील एवं जलवायु-सहिष्णु नियोजन दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मैदानी क्षेत्रों पर आधारित पारंपरिक शहरी मॉडल पर्वतीय संदर्भ में प्रभावी सिद्ध नहीं हुए हैं और स्थानीय भू-आकृति, जलवायु एवं संस्कृति के अनुरूप नियोजन ढांचे आवश्यक हैं।
डॉ. अखिलेश कुमार, एसोसिएट प्रोफेसर, आर्किटेक्चर एवं प्लानिंग विभाग, डीआईटी विश्वविद्यालय, देहरादून ने भौतिक अवसंरचना को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने विशेष रूप से ड्रेनेज, जलापूर्ति, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन एवं सीवेज निपटान पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही, जिनका सीधा संबंध ढलान सुरक्षा, जन-स्वास्थ्य एवं पर्यावरण संरक्षण से है।
आर्किटेक्ट कुनुकु तमोगाना, सहायक प्रोफेसर, आर्किटेक्चर एवं प्लानिंग विभाग, डीआईटी विश्वविद्यालय, देहरादून ने हाइब्रिड वास्तुकला निर्माण पद्धतियों पर विचार साझा करते हुए पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक इंजीनियरिंग के संतुलित समन्वय की आवश्यकता बताई, ताकि सुरक्षा, भूकंपीय सहनशीलता एवं जलवायु आराम सुनिश्चित किया जा सके।
क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने पर अपने दशकों के अनुभव साझा करते हुए डॉ. ललित पांडे, अध्यक्ष, उत्तराखंड सेवा निधि पर्यावरण शिक्षा संस्थान, अल्मोड़ा ने सतत पहाड़ी विकास में सामाजिक-सांस्कृतिक निरंतरता एवं सामुदायिक भागीदारी के महत्व को रेखांकित किया। डॉ. अजय गरोला ने हिमालयी परिस्थितियों के अनुरूप एकीकृत एवं विशेषीकृत निर्माण तकनीकों तथा नियोजन प्रणालियों को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
आयोजकों ने विश्वास व्यक्त किया कि यह अध्ययन योजनाकारों, वास्तुविदों, अभियंताओं, नीति-निर्माताओं एवं स्थानीय प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ सिद्ध होगा तथा उत्तराखंड एवं व्यापक हिमालयी क्षेत्र में सुरक्षित, लचीली एवं सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ पहाड़ी बसावटों के निर्माण में सार्थक योगदान देगा।
कार्यक्रम में पूर्व मुख्य सचिव उत्तराखण्ड श्री इन्दु कुमार पांडे, श्रीमती विभा पुरी दास,डॉ. पंकज नैथानी, चन्द्रशेखर तिवारी, डॉ. कुसुम नौटियाल, डॉ. योगेश धस्माना, सुंदर सिंह बिष्ट, जगदीश सिंह महर सहित अनेक युवा छात्र शिक्षाविद, पेशेवर एवं अन्य लोग उपस्थित रहे।











