अर्चना पैन्यूली के उपन्यास ‘अलकनंदा सुत’ का लोकार्पण दून पुस्तकालय में

अर्चना पैन्यूली के उपन्यास ‘अलकनंदा सुत’ का लोकार्पण दून पुस्तकालय में

देहरादून 2 जनवरी, 2026। समकालीन हिंदी साहित्य की चर्चित प्रवासी लेखिका अर्चना पैन्यूली की नवीन पुस्तक ‘अलकनंदा सुत’ का लोकार्पण व उस पर बातचीत का एक कार्यक्रम दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से किया गया. केन्द्र के सभागार में एक गरिमामय समारोह में संपन्न इस कार्यक्रम में साहित्य, प्रशासन और बौद्धिक जगत की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों की उपस्थिति रही।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं साहित्यकार डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’उपस्थित रहे। समारोह में प्रमुख वक्ता के रूप में उत्तराखंड की पूर्व मुख्य सचिव राधा रतूड़ी, पूर्व डीजीपी अनिल रतूड़ी, पूर्व कुलपति एवं वरिष्ठ लेखिका सुधारानी पांडे, प्रतिष्ठित कवि बुद्धिनाथ मिश्र तथा भाषाविद् सरोजिनी नौटियाल ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन साहित्यकार मुकेश नौटियाल ने किया।

वक्ताओं का कहना था कि अलकनन्दा सुत जैसी कहानियाँ लिखी नहीं जातीं-वे पहाड़ की मिट्टी में उपजती व वहां की हवा में गूँजती हैं और नदी के शोर में गुम हो जाती हैं।

उपन्यास का मुख्य किरदार शिवानन्द गैरोला, महज़ एक नाम नहीं है एक जिजीविषा है जो गढ़वाल की घाटियों में राह बनाती है, चट्टानों से टकराती है, थकती है पर हार नहीं मानती। मानव के अदम्य मनोबल का मूर्तमान शिवानन्द कभी रुकता नहीं है। वह चलता है, बस चलता रहता है।

उत्तराखंड की पृष्ठभूमि पर आधारित कृति ‘अलकनंदा सुत’ में लेखिका ने भौगोलिक परिवेश, सांस्कृतिक चेतना, मानवीय संवेदनाओं तथा जीवन के विविध पक्षों को सशक्त साहित्यिक अभिव्यक्ति दी है। पुस्तक का प्रकाशन देश के प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान वाणी प्रकाशन द्वारा किया गया है।

इस अवसर पर पूर्व डीजीपी अनिल रतूड़ी ने कहा, ‘अलकनंदा सुत’ मानव जीवन का एक प्रकार से विश्वकोश है।‘

वरिष्ठ लेखिका सुधारानी पांडे ने पुस्तक को पहाड़ के जीवन-संघर्षों की संवेदनशील अभिव्यक्ति बताया। उन्होंने कहा, ‘अर्चना पैन्यूली सात समन्दर पार प्रवासी जीवन में हिदी और भारतीय साहित्य के महत्व के साथ उत्तराखंड के गौरव को भी नहीं भूली हैं।‘

पूर्व मुख्य सचिव राधा रतूड़ी ने कहा, ‘अलकनंदा सुत’ में पहाड़ी ग्रामीण परिवेश और पहाड़ के संघर्षों का सजीव चित्रण देखने को मिलता है।‘

डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा, ‘अर्चना जी यूरोप के छोटे-से देश डेनमार्क में रहकर भी अपने उपन्यासों से हिन्दी पाठकों को प्रवासी भारतीय जीवन का नया स्वाद देती रही हैं। इससे पहले उनका ‘ह्वेयर डू आई बिलांग ‘ वैश्विक स्तर पर चर्चित और पुरस्कृत हो चुका है। नया उपन्यास ‘अलकनंदा सुत’ उत्तराखंड के कठिन पर्वतीय जीवन को बड़ी बारीकी से चित्रित करता है। इसमें गढ़वाल की आंचलिक विरासत का वह ताना-बाना है जो अलकनंदा नदी की भांति ही दुर्गम पहाड़ी मार्गों पर चट्टानों से टकराती हुई अग्रसर हुई है। इस दृष्टि से अर्चना जी शिवानी जी की परंपरा को आगे बढ़ाती हुई दिखती हैं।‘

भाषाविद् सरोजिनी नौटियाल ने उपस्थित दर्शकों को लेखिका के साहित्यिक योगदान से परिचित कराया।

लेखिका अर्चना पैन्यूली ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में कहा, “मेरे लिए यह क्षण केवल एक साहित्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि गहरा भावनात्मक अनुभव है। अपने मूल शहर देहरादून में साहित्यिक हस्तियों, मित्रों, पारिवारिक जनों और स्नेही पाठकों की उपस्थिति में ‘अलकनंदा सुत’ का लोकार्पण होना मेरे लिए अत्यंत गौरव की बात है।”

उल्लेखनीय है किअर्चना पैन्यूली 1997 से डेनमार्क में निवास कर रही हैं, जहाँ वे नॉर्थ सीलैंड इंटरनेशनल स्कूल में अध्यापन कार्य से जुड़ी हैं। कथा-साहित्य में इनकी विशिष्ट पहचान है। उनकी रचनाओं में स्कैंडिनेवियन प्रायद्वीप-विशेषतः डेनमार्क के मानवीय जीवन, सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना तथा राजनीतिक और भौगोलिक परिवेश का गहन और सजीव चित्रण मिलता है।

उनकी नौ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने डेनिश साहित्य की कई कृतियों का हिन्दी में अनुवाद भी किया है।डेनिश समाज पर केन्द्रित हिन्दी में लिखा गया उनका उपन्यास वेयर डू आई बिलांग अंग्रेजी में भी प्रकाशित है। उनका चर्चित उपन्यास कैराली मसाज पार्लर हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी, मराठी और कन्नड़ भाषाओं में भी उपलब्ध है।

कार्यक्रम के आरम्भ में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के निदेशक श्री एन. रवि शंकर तथा कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी द्वारा उपस्थित अतिथियों व सभागार में उपस्थित सभी साहित्यप्रेमियों का स्वागत और धन्यवाद किया। अर्चना पैन्यूली के इस उपन्यास पर हुई सार्थक बातचीत से यह आयोजन साहित्यकारों,पाठकों व साहित्य प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण रहा.

इस अवसर पर डॉ. योगेश धस्माना, डॉ. विद्या सिंह,डॉली डबराल, राजीव नयन बहुगुणा, कुसुम भट्ट, सुंदर सिंह बिष्ट, जगदीश सिंह महर, भारती मिश्रा, डॉली डबराल,सुप्रिया रतूड़ी,हरि चंद निमेश,मदन मोहन कण्डवाल,सोमवारी लाल उनियाल,मोहन सिंह, जय भगवान गोयल,. डाॅ. लालता प्रसाद,डी. के. पाण्डे, बैचेन कण्डवाल,जगदीश बाबला, शिव मोहन सिंह,देवेन्द्र कांडपाल,कुलभूषण नैथानी, आलोक सरीन, ललित राणा सहित बड़ी संख्या में शहर के अनेक गणमान्य,प्रबुद्धजन,साहित्यकार,पाठक, साहित्य प्रेमी व अन्य लोग उपस्थित रहे।