दून पुस्तकालय में अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस पर हुआ पलायन, शिक्षा और सांस्कृति पर मंथन

दून पुस्तकालय में अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस पर हुआ पलायन, शिक्षा और सांस्कृति पर मंथन

देहरादून, 11 दिसम्बर, 2025, आज प्रातः कालीन सत्र में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र तथा आईआईपीए द्वारा सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘उत्तराखंड @25’ के आलोक में पलायन, शिक्षा, पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत के गहन बिन्दुओं पर महावपूर्ण चर्चा का आयोजन किया गया.

अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस के अवसर पर डॉ. आर. एस. टोलिया फोरम तहत ‘उत्तराखंड @25 : लुकिंग बैक–लुकिंग फारवर्ड’ पुस्तक में प्रकाशित आलोक पर एसडीएफयू तथा दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र और की साझा पहल से इस अवसर पर राज्य की स्थापना के 25 वर्षों की विकास यात्रा, नीतिगत चुनौतियाँ, पलायन, शिक्षा, पर्यावरण, संस्कृति और भविष्य की दिशा पर विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे।

चर्चा से पूर्व एसडीएफयू की ओर से एस टी एस लेप्चा ने इस संगोष्ठी के बारे में बताया और डॉ. सुधा रानी पाण्डेय ने बीज वक्तव्य दिया. कार्यक्रम के आरम्भ में उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्य सचिव स्व. डॉ आर एस टोलिया को श्रद्वांजलि भी दी गई.

पहला सत्र लोकनीति, सुशासन और पलायन पर चर्चा पर केन्द्रित रहा. इस . सत्र का संचालन समाजसेवी अनूप नौटियाल ने किया। इस पैनल में

श्री अनिल रतूड़ी, पूर्व पुलिस महानिदेशक, उत्तराखंड, श्री कृपा नौटियाल, (सेवा नि. अतिरिक्त महा निदेशक इंडियन कोस्ट गार्ड), श्री एस. एस. नेगी, (सेवा नि. आईएफएस ) रहे.

इस सत्र में राज्य में बढ़ते पलायन, सीमावर्ती क्षेत्रों की संवेदनशीलता, यातायात और सुरक्षा प्रबंधन, तथा भविष्य की चुनौतियों पर गहन विमर्श हुआ।

पूर्व डीजीपी अनिल रतूड़ी ने कहा कि उत्तराखंड में लगातार बढ़ती जनसंख्या, तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या और तेजी से बढ़ते यातायात दबाव को देखते हुए पुलिस और परिवहन प्रणाली को और अधिक सक्षम बनाने की जरूरत है।

कृपा नौटियाल ने सीमावर्ती जिलों—पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी—से हो रहे पलायन को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि “सीमा से खाली होते गांव देश की सुरक्षा चेन को कमजोर करते हैं।”

एस. एस. नेगी ने बताया कि कोविड-19 के बाद राज्य में लगभग 75 फीसदी पलायन आंतरिक रहा है। लोग गांव छोड़कर नजदीकी कस्बों में बस रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि यदि गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं, तो पलायन को काफी हद तक रोका जा सकता है।

दूसरा सत्र शिक्षा, पर्यावरण और महिला सशक्तिकरण पर संवाद पर केन्द्रित रहा. इसकी अध्यक्षता बिनीता शाह ने की। इस पैनल में शामिल रहे—श्रीमती किरण सूद, (वरिष्ठ सामाजिक अध्येता ) श्रीमती सुधा रानी पांडेय, (पूर्व कुलपति) व प्रो. डॉ. दाताराम पुरोहित, संस्कृति विशेषज्ञ. डॉ.किरण सूद ने कहा कि “हिमालय केवल पहाड़ नहीं, बल्कि जीवन का ज्ञानकोष है।” उन्होंने यात्रियों और स्थानीय समुदाय के बीच स्वच्छता, पर्यावरण जागरूकता और पारिस्थितिक संतुलन को प्राथमिकता देने की अपील की।

सुधा रानी पांडेय ने कहा कि उत्तराखंड शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। उन्होंने सभी विश्वविद्यालयों में समान और गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि “मूल्यपरक और रोजगारपरक शिक्षा ही राज्य को सशक्त भविष्य दे सकती है।”

डॉ. दाताराम पुरोहित ने उत्तराखंड में सांस्कृतिक पर्यटन की अपार संभावनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि “सांस्कृतिक पर्यटन से न केवल रोजगार सृजित होगा, बल्कि पलायन पर भी अंकुश लगेगा।”

इस सत्र में पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, सरयू नदी की सांस्कृतिक यात्रा और उत्तराखंड की सामाजिक पहचान पर भी चर्चा हुई।

उत्तराखण्ड @25 पुस्तक का मुख्य संपादक एन. एस. नपलच्याल, एन. रवि शंकर,व डॉ. सुधा रानी पाण्डेय ने किया है। पुस्तक में 28 शोध लेख, राज्य की 25 वर्ष की विकास यात्रा को 31 लेखकों और सह-लेखकों द्वारा लिखित 28 शोध–आधारित लेखों द्वारा किया गया है। पुस्तक में शासन-प्रशासन, अर्थव्यवस्था, आपदा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, पलायन समस्या, पर्यटन, सामाजिक विकास और आने वाले 25 वर्षों की चुनौतियों पर विस्तृत विश्लेषण है।